बनारसी ताने-बाने को चाट गया कोरोना

लाकडाउन में उलझी बनारस के बुनकरों की जिंदगी, अब रुला रहा फांकाकसी का दर्द

विजय विनीत 
वाराणसी। बनारस की साड़ियां फैशन नहीं, परंपरा हैं। ऐसी परंपरा, जिसकी रस्म दुनिया भर में निभाई जाती है। शादी कहीं भी हो, दांपत्य का रिश्ता बनारस की रेशमी साड़ियों से ही गाढ़ा होता है। बनारस के जिन घरों में ये रिश्ते बुने जाते थे, लॉकडाउन के चलते अब वो संकट में हैं। धंधा जाम है, इसलिए बुनकरों के पेट खाली हैं। उन इलाकों में हालात बहुत अधिक खराब हैं जहां कोरोना के मरीज पाए गए हैं और ऐसे इलाकों को सील कर दिया गया है। जो इलाके खुले हैं, वहां भी साड़ी बुनाई ठप है। शहर बंद और बाजार बंद तो किसके लिए बुनें रेशमी रिश्ते? 
बनारस के मदनपुरा, लोहता, बजरडीहा, पितरकुंडा में कोरोना के मरीज पाए गए हैं। बुनकर बाहुल्य वाले इन इलाकों को हॉटस्पॉट घोषित किया गया है। न कोई आ सकता है, न उधर जा सकता है। इस वजह से यहां भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए हैं। मदनपुरा के जावेद कहते हैं, लाकडाउन के एक महीने कब के बीत गए। काम ठप है। पहले रोज कमाते थे तब जल पाता था चूल्हा। कुछ दिन उधारी से काम चला। अब वो भी नसीब नहीं हो रहा। पेट खाली है। समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे चलेगी जिंदगी? 
बजरडीहा में हालात और भी ज्यादा खराब हैं। इस इलाके में ज्यादातर बुनकर गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं। अब इन्हें रोटी मयस्सर नहीं हो पा रही है। जक्खा के मुख्तार परेशान हैं। कहते हैं, बनारसी साड़ी उद्योग की हालत पहले से ही पतली थी। अब और भी ज्यादा खराब हो गई है। साड़ियों का ताना-बाना लपेट दिया गया है। बजरडीहा के मुर्गियाना टोला के अब्दुल कहते हैं कि अब तो एक वक्त का खाना ही नसीब नहीं। हालात इतने खराब हो गए हैं कि इफ्तार के लिए पास में कुछ भी नहीं है। बच्चों को भी कई दिन भूखे रहना पड़ रहा है। 



बुनकर नजीर अहमद नाटी इमली में रहते हैं। बुनकरी से पेट नहीं भरा तो ई-रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। इसी बीच कोरोना का साया गहाराय और उनके सुनहरे ख्वाब दफन हो गए। नजीर की तरह अंसार अहमद, गुलजार अहमद, अब्दुल कलाम, वाजिद समेत अनगिनत बुनकर खून के आंसू रो रहे हैं। लाकडाउन के चलते इन बुनकरों के पुश्तैनी धंधे बंद हैं। पीलीकोठी के हफीजुर्रहमान लाकडाउन में काफी तंगहाल हैं। इनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। पहले घर में साड़ी बुनते थे और अब वो भी बंद है। 
सदियां बीत गईं। बनारसी साड़ियां और हस्तशिल्प का काम कभी बंद नहीं हुआ। लाकडाउन के बाद हालात ऐसे बन गए हैं कि अब तो इस उद्योग की धड़कन ही बंद हो चुकी है। कारोबार बर्बाद हो गया है। सरैया इलाके के बुनकर अतीकुर्रहमान, अनीसुर्रहमान और मोइनुद्दीन हर किसी को अपना दुखड़ा सुना रहे हैं। मगर इनकी कोई सुनने वाला नहीं है। सपा सुप्रीमो आखिलेश यादव ने हाल में बनारस के बुनकरों की आवाज उठाई थी। उन्होंने इनकी बदहाली उजागर करते हुए कहा था, -बनारस प्रधानमंत्री का इलाका है। यहां बुनकरों की दशा बेहद खराब है। लॉकडाउन में फंसे पूर्वांचल के 4 लाख 30 हजार बुनकर परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट है। उनके कामधंधे बंद हैं। पास में फूटी कौड़ी नहीं है। खाने-पीने का सामान खरीदने के लिए कहां से लाएंगे पैसे? सूचना तो यह भी है कि भाजपा के लोग सरकारी राहत पैकेज सिर्फ अपने समर्थकों को बांट रहे हैं। गरीब बुनकरों को पूछने वाला कोई है ही नहीं।
सरैया के मौलवी मोइनुद्दीन बताते हैं कि लाकडाउन से पहले बनारस की हर गली से आती थी खटर-पटर की आवाज। खुशहाल थे साड़ी के बुनकर और कारोबारी। अब तस्वीर उल्टी है। अब सब बदहाल हैं। रोटी के लिए मोहताज हैं। बुनकरों के नसीब में अगर कुछ है तो सिर्फ बजबजातीं नालियां और सड़कों पर बहता सीवर का गंदा पानी। साथ ही ठोकर मारती सड़कें। वो यह भी कहते हैं कि बजरडीहा हो या फिर, सरैयां, कोनिया, अशफाक नगर और लोहता। बुनकरों की ये बस्तियां बदहाली की मिसाल हैं। पावरलूम तो पहले ही बिजली के स्मार्ट मीटर के बीच फंसकर दम तोड़ चुका है। लाकडाउन ने बची-खुची कसर पूरी कर दी। कोरोना ने बुनकरों की जिंदगी के ताने-बाने को इतना बड़ा दर्द दे दिया है, जिसे सह पाना अब कठिन हो गया है। लोहता के बुनकर रियाज कहते हैं,- ‘हाटस्पाट इलाके में ज्यादा तकलीफ दे रहा है मौसम। आंधी-बारिश जारी रही तो मशीनें भी खराब हो जाएंगी। कपड़ा बुनना कठिन हो जाएगा।’



सालों-साल सालेगा लाकडाउन का दर्द


मुश्किल में है बनारस के एक लाख बुनकरों की जिंदगी 


वाराणसी। बनारस में बुनकरों की तादाद करीब एक लाख है। इनके परिजनों को जोड़ दिया जाए तो इस धंधे से करीब सात लाख लोगों का सरोकार जुडता है। बनारसी साड़ी उद्योग का टर्नओवर करीब डेढ़ हजार करोड़ सालाना है। बनारस में इतना ही है पर्यटन का कारोबार। मगर अफसोस। साड़ी उद्योग में बुनकरों का हिस्सा बीस फीसदी भी नहीं है। इसीलिए लाकडाउन में वो मुश्किल में हैं। 
बनारसी साड़ी के कारोबारी हाजी जुबेर कहते हैं कि सरकारें बुनकरों की भलाई के लिए योजनाएं तो बहुत बनाती हैं, लेकिन उनपर अमल नहीं हो पाता। पैसा आता है, मगर बुनकरों तक नहीं पहुंचता। लाकडाउन खुलेगा तब भी सियासतदां नहीं बता पाएंगे कि आखिर कहां चला गया बुनकरों की जिंदगी को खुशनसीब बनाने के लिए आने वाला सरकारी धन?  
लल्लापुरा के बुनकर इदरीस अंसारी कहते हैं कि लाकडाउन तो अब है। साल 1989 के दो फैसलों ने बनारस के बुनकरों को पहले ही तबाह कर दिया था। पहला था, पावरलूम के इस्तेमाल की इजाजत और दूसरी थी यूपी हैंडलूम और यूपिका के जरिए बुनकरों का तैयार माल लेना बंद करना। बुनकर वजाउद्दी अंसारी कहते हैं कि कुछ लोग गलत हो सकते हैं, पर हर कोई नहीं। 
इस बीच बनारस में बंद पड़े हथकरघा उद्योग को खोलने के लिए बुनकर दस्तकार अधिकार मंच के अध्यक्ष इदरीस अंसारी ने पीएम नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई है। साथ ही यह भी आग्रह किया है कि लाकडाउन में बुरी तरह टूट चुके बुनकरों को आर्थिक मदद दी जाए। 
श्री अंसारी ने पत्र में यह भी लिखा है कि महीनों से पावरलूम और हथकरघा उद्योग बंद हैं। रोज कमाने और खाने वाले बुनकरों के पास न पैसा है, न भोजन। बुनकर समाज में तीन तरह के लोग हैं। एक मजदूर, दूसरे मालिक (पावरलूम या हथकरघा चलाने वाले और तीसरे व्यापारी। सबसे बुरा हाल मिडिल क्लास वालों की है। वो न किसी का हेल्प ले पा रहे हैं, न किसी को दे पा रहे हैं।