बनारस की मुसहर बस्तियों में बदल गया 'जिंदगी का गीत'
जो बच्चे खा रहे थे घास, अब उन्हें मिल रहे महंगे बिस्कुट और टॉफियां


फॉलोअप : विजय विनीत(vijay vineet)

वाराणसी। लाकडाउन होने के बाद महीने भर पहले पूर्वांचल की मुसहर बस्तियों में भुखमरी थी..., तंगहाली थी... और जिंदा रहने की जद्दोजहद थी। एक महीने बाद वो मंजर बदल गया। हालात पूरी तरह बदल गए। योगी सरकार ने उस समुदाय के लोगों को नई जिंदगी दी है, जो लाकडाउन के बाद एक-एक रोटी के लिए मोहताज थे। भूख से अतड़ियां कुलबुला रहीं थीं। कुछ के बच्चे घास खाने तक को विवश हो गए थे। मुसहर वो समुदाय है, जो दुर्भाग्य से चूहे-खाने वालों के रूप में जाना जाता है।


यूपी में मुसहर समुदाय की आबादी करीब सात लाख है। यह समुदाय 1556 बस्तियों में रहता है, जो गरीबों में सबसे गरीब है। सीएम योगी आदित्यनाथ यूपी के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने इस समुदाय के दर्द को शिद्दत से समझा। साथ ही मुसहर समुदाय की जिंदगी की मुश्किलों को आसान बनाने की पुख्ता कोशिश की। हमने शुक्रवार को पूर्वांचल की तमाम मुसहर बस्तियों में पहुंचकर इस समुदाय के लोगों का हाल जानने की कोशिश की। कुछ बस्तियों में खाने-पीने की थोड़ी दिक्कत जरूर दिखी, लेकिन कोई भी ऐसा घर नहीं था, जिसमें चूल्हा न जला हो और उसकी राख से क्षीण ही सही, धुआं उठ न उठ रहा हो।

गुरुवार को हम बड़ागांव के कोइरीपुर मुसहर बस्ती में पहुंचे। यह वही गांव है, जहां पिछले महीने भूख बड़ा सवाल था। बच्चे अंकरी घास खाने को विवश थे। ‘जनसंदेश टाइम्स’ ने 26 अप्रैल 2020 को मुसहर समुदाय की विवशता को उजागर किया था। खबर का असर हुआ और सरकार सक्रिय हुई। मुसहर समुदाय के लोगों के घरों में अब इतना अनाज पहुंच गया, जितना उन्होंने अपनी समूची जिंदगी में एक साथ देखा भी नहीं था। इस बस्ती में जहां पहले मरघटी सन्नाटा था, वहीं अब मंगल गीत गाए जा रहे हैं। वो भी तब, जब लाकडाउन के चलते हर किसी के सामने रोजी-रोटी का बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। कोइरीपुर मुसहर बस्ती के नंदू वनवासी बताते हैं, -'मेरे पास पर्याप्त राशन है। अब कोई लाचारी नहीं है। महीने भर पहले भूख से मर रहे थे। महाराज जी ने हम लोगों का घर भर दिया है। अब खाना भी मिल रहा है और राशन भी, दिन-रात की चिंता अब सकून की शक्ल अख्तियार कर रही है।'  इसी बस्ती के सोमारू, पिन्टू, सोनू, कतवारू, गुड्डू, प्रदीप कहते हैं कि अब उनके दिन फिर गए हैं। सरकार ने इतना कुछ भेज दिया है, जिसकी वो कल्पना भी नहीं करते थे। सिर का बोझ अब हल्का हो गया है। गरीब आदमी को दो वक्त खाना मिले तो उसका अर्थ समझिए। इतना ही नहीं, थाने से भी खाना आ रहा है। गाहे-बगाहे  कुछ संस्थाएं भी राशन-भोजन भेज रही हैं। दिन बदल गया है तो सोच भी बदली है।


कोइरीपुर मुसहर बस्ती के लोग आज भी पिछले दिनों को याद करते हैं जब कोरोना के चलते अचानक लाकडाउन हुआ था। भोनू वनवासी कहते हैं, 'हमें नहीं मालूम कि कहां क्या लिखा-पढ़ा गया? अखबारों में क्या छपा? इतना जरूर जानते हैं कि हमारी भूख की सुध लेने आप ही लोग गांव में आए थे। इसके बाद से ही बदलाव का दौर शुरू हुआ। जो पहले सच था, वो हमने कहा था और आज जो सच है वो भी बता रहे हैं। हमें सियासत नहीं आती। हम आज भी कहेंगे कि महीने भर पहले हम घास खा रहे थे। आप लोगों ने आवाज उठाई तो हमारी थाली में खाना आ गया। भूखे के लिए भोजन से बड़ा भजन कुछ नहीं।' भोनू ने मन की बात जारी रखी, कहा-'आइए हमारे घरों को देख लीजिए। योगी बाबा ने हमें क्या नहीं दिया? खाने भर का राशन दे दिया। हमारे बच्चों ने जो बिस्कुट-टाफी देखी भी नहीं थी, उसका स्वाद चखा दिया। ये क्या कम है। इसका श्रेय तो हम आपको ही देंगे।' 

बड़ागांव प्रखंड की बरही कला मुसहर बस्ती में हम अचानक पहुंचे। यहां भी खाने की कोई समस्या नही है। कोटे का राशन मिल चुका है। गृहस्थी के और भी सामान सजे हैं घरों में। अब कुछ इत्मीनान है। इस बस्ती के रामसागर, लालचंद, राजाराम, मुरली ने बताया कि पीवीसीएचआर की श्रुति नागवंशी ने हमारी दिक्कतों को हल किया है। खाने-पीने का कोई संकट नहीं है। राशन भी है और दूसरे सामान भी। 


हम सुबह राजातालाब इलाके के मेहंदीपुर मुसहर बस्ती पहुंचे। यहां शांति थी, कुछ पा लेने का इत्मीनान पसरा था, और सबके घरों के चूल्हे में आंच की गर्मी थी। धर्मा ने कहा, 'हुजूर झूठ क्यों बोलें। देखिए, अब हमारे पास कोई दिक्कत नहीं है। बच्चों ने सुबह की भात-चटनी खा लिया है। पहले भी यही सब खाते थे। सब्जी पहले भी यदा-कदा ही नसीब हो पाती थी और इस समय तो मिल ही नहीं रही है।' रवि वनवासी परिवार के साथ भट्ठे पर काम करने गए थे। इनके घर पर ताला लटका मिला। विधवा लालती को खाने-पीने की दिक्कत नहीं है, पर इन्हें विधवा पेंशन की दरकार जरूर है। इन्हें चार छोटे बच्चों का पालन-पोषण जो करना पड़ रहा है। धर्मेंद्र और सुभावती ने कहा,-'हमें उतना ही चाहिए, जितनी जरुरत है। लाकडाउन में काम नहीं मिल रहा। पेट भर जाए। यही बड़ी बात है।'

वीरभान मुसहर बस्ती का सीन भी दूसरी बस्तियों जैसा ही है। इस बस्ती में लल्लू की पत्नी रजवंती के चार बच्चे हैं। लाकडाउन में भी सब खुशहाल हैं। खाने-पीने की दिक्कत नहीं। यहां संगीता को इसलिए राशन खरीदना पड़ रहा है कि उसके पास कोई कार्ड ही नहीं है। वो कहती है, 'चार बच्चों का पेट कैसे पालें? उधारी पर जिंदा हैं।' वीरभानपुर मुसहर बस्ती का हाल ये है कि यहां कोई भी गाड़ी रुकती है, ग्रामीणों का रेला ये सोचकर जुटने लगता है कि शायद कुछ मिल जाय। पाता की नीयति ही दाता की बाट जोहने की होती है। लेकिन याद आया कि सोशल डिस्टेंशिंग का समय है, सो गांव से हम तत्काल निकल गए। 


वाराणसी से करीब 25 किमी दूर बेलवा मुसहर बस्ती में अनाज पहुंच चुका है। यहां पेट की आग कोई मुद्दा नहीं है। लेकिन ये वो बस्ती है जहां साल 2006 में भूख से पांच बच्चों की मौत हो गई थी। पीपल्स विजिलेंस कमेटी फॉर ह्यूमन राइट्स और एशियन ह्यूमन राइट्स की वजह से ये गांव सुर्खियों में आया। मौतों का दस्तावेजीकरण हुआ। तब पता चला कि मोनू मुसहर का एक साल का लड़का और एक नवजात बच्ची, जो बेनाम ही दुनिया से रुखसत हो गयी थी। आयर मुसहर बस्ती में भी खाने-पीने की चीजें पहुंच चुकी हैं। हमने गहन पड़ताल की तो पता चला कि सिर्फ वाराणसी ही नहीं, सोनभद्र, जौनपुर, मिजार्पुर और कुशीनगर में लाकाडाउन के बावजूद हालात खराब नहीं है। बीमारी को लेकर लोग भले ही जागरूक नहीं है, लेकिन भोजन की कहीं दिक्कत नहीं है।